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अलनीनो का असर: भारत में कमजोर मानसून से फसल और महंगाई पर बढ़ी चिंता

By b9599789@gmail.com
September 18, 2026

भारत में इस साल कमजोर मानसून ने कृषि और खाद्य कीमतों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, मजबूत होते अलनीनो के कारण बारिश प्रभावित हुई है। यदि वर्षा की कमी आगे भी जारी रहती है, तो 2009 के बाद यह भारत का सबसे कमजोर मानसून साबित हो सकता है।

सामान्य से 15 प्रतिशत कम बारिश

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, जून से सितंबर के बीच चलने वाले मानसून सीजन में अब तक देश में सामान्य से लगभग 15 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। यदि यही स्थिति बनी रहती है, तो 2026 का मानसून 2009 के बाद सबसे कमजोर हो सकता है। वर्ष 2009 में देश में सामान्य से 18 प्रतिशत कम बारिश हुई थी।

इससे पहले मई में मौसम विभाग ने पूरे मानसून सीजन के दौरान सामान्य से करीब 10 प्रतिशत कम बारिश का अनुमान जताया था। अब वास्तविक वर्षा की स्थिति शुरुआती पूर्वानुमान से भी कमजोर दिखाई दे रही है।

बंगाल की खाड़ी से सीमित राहत की उम्मीद

ऑस्ट्रेलिया की मौसम परामर्श कंपनी ग्लोबल वेदर क्लाइमेट एनालिटिक्स के प्रबंध निदेशक क्रिश्चियन वर्नर के अनुसार, सितंबर के अंतिम सप्ताह में बंगाल की खाड़ी के ऊपर उष्णकटिबंधीय चक्रवात के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।

यदि ऐसा सिस्टम विकसित होता है, तो पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में अच्छी बारिश हो सकती है। इससे इन क्षेत्रों में बारिश की कमी कुछ कम होने की संभावना है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे देशभर की कुल बारिश में आई कमी पर बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। पूरे सीजन में बारिश की कमी 13 से 16 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान जताया गया है।

मानसून को लेकर ब्रिटेन के प्लेटफॉर्म का अनुमान

ब्रिटेन की लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी से जुड़े पूर्वानुमान प्लेटफॉर्म CRUCIAL ने भी भारत के मानसून को लेकर चिंता जताई है। प्लेटफॉर्म के संस्थापक और प्लैनेटरी साइंटिस्ट मार्क रॉल्स्टन के मुताबिक, सीजन समाप्त होने में दो सप्ताह से कम समय बचा है।

CRUCIAL के आकलन में 68 प्रतिशत संभावना जताई गई है कि मानसून के अंत तक देश में बारिश सामान्य से 10 से 20 प्रतिशत कम रह सकती है। यह अनुमान मौजूदा वर्षा घाटे और शेष मानसून अवधि में सीमित सुधार की संभावना को ध्यान में रखकर लगाया गया है।

खेती पर पड़ सकता है सीधा असर

भारत की कृषि व्यवस्था मानसूनी बारिश पर काफी निर्भर है। देश में धान, गन्ने और कपास जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में मानसून की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। लाखों किसान सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर हैं, जबकि कई इलाकों में जलाशयों और भूजल स्रोतों पर भी मानसून का असर पड़ता है।

लंबे समय तक बारिश कम रहने से दो स्तरों पर नुकसान हो सकता है:

  • मौजूदा फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
  • अगली फसल की बुवाई में देरी या कमी आ सकती है।
  • जलाशयों और सिंचाई स्रोतों में पानी का स्तर घट सकता है।
  • ग्रामीण आय और कृषि आधारित कारोबार पर दबाव बढ़ सकता है।

कमजोर मानसून का असर कई राज्यों में अलग-अलग रूप में दिखाई दे सकता है। कुछ क्षेत्रों में सामान्य या अधिक बारिश होने के बावजूद देश के बड़े हिस्से में कमी बनी रहने पर राष्ट्रीय कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा

बारिश की कमी का असर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। अगस्त में भारत की खाद्य महंगाई लगातार सातवें महीने बढ़कर 5.95 प्रतिशत हो गई, जो इस साल का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। चावल, गन्ने और मक्के की बुवाई भी पिछले सीजन की तुलना में पीछे चलने की खबर है।

क्वांटइको की अर्थशास्त्री युविका सिंघल के अनुसार, सामान्य स्तर की तुलना में बारिश में प्रत्येक एक प्रतिशत की कमी खाद्य महंगाई को औसतन करीब 25 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ा सकती है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव फसल, क्षेत्र, सरकारी भंडार और बाजार में उपलब्धता जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा।

सरकार ने उठाए आपूर्ति संबंधी कदम

खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के उद्देश्य से शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। इसके अलावा, कुछ राज्यों में उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सब्सिडी वाले दाम पर प्याज की बिक्री की जा रही है।

फिलहाल बंगाल की खाड़ी में बनने वाली किसी संभावित मौसम प्रणाली से पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों को राहत मिल सकती है, लेकिन इससे पूरे देश में बारिश की कमी दूर होने की संभावना सीमित है। इसलिए आने वाले समय में फसल उत्पादन, जल उपलब्धता और खाद्य कीमतों पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा।

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